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बचपन का सबसे बड़ा और मासूम नशा ….हमारी ‘कॉमिक्सें’

कॉमिक्स जिसे हिंदी में और छोटे शहरों और गाँवों में चित्रकथा कहा जाता था , उसकी सुनहरी यादों की जुगाली की कोशिश ….

गर्मी की छुट्टियों का जो सबसे उजला और ना भूलने वाला पक्ष वो है, जो हमें आज भी “डायलॉग” के साथ याद है, और वो है हमारी सबसे ज्यादा प्यारी “कॉमिक्स” का दौर ..

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राज कॉमिक्स, डायमंड कॉमिक्स, अमर चित्रकथा, दिल्ली प्रेस बुक और  मनोज पॉकेट बुक्स, तुलसी कॉमिक्स और इंद्रजाल   की अद्भुत और ज़बरदस्त रोचक कॉमिक्सों ने भारत के बच्चों को इतनी मीठी यादें दी  हैं कि उनके नशे का असर आज भी ३० से ५० साल के लोगों को पलभर में बच्चा बन देता है | 

लाइब्रेरी और छोटे शहरों या गाँवों की वाचनालयों में बिकती और किराये से दिए जाने वाले इस मासूम से साहित्य लोक ने 80 के दशक से जो धूम मचाई थी, वो आज के कार्टून नेटवर्क और विडिओ गेम्स से बहुत ज्यादा चमकीली और  सांस्कृतिक थीं| 

 

याद है ना,  कई हीरोज़ दिए इस विधा ने भारत के बच्चों को , चाचा चौधरी, साबू , पिंकी, बिल्लू, नागराज , सुपर कमांडो ध्रुव , परमाणु, डोगा , तौसी, चन्नी चाची , डैडी जी , ताऊ जी, लंबू -छोटू , मोटू-पतलू , घसीटाराम  जैसे हीरोज़ जिनके कारनामो की धूम ने हमें जीवन में इन  जैसा बनाने के सपने दिखाए थे | 

 

मेरे कस्बे महिदपुर के श्रीराम वाचनालय में  पतली कॉमिक्स २५ पैसे में दिन भर , और फिर आई थी डाइजेस्ट (मोटीवाली कॉमिक्स ) ५०-७५ पैसे फिर कभी कभी  १ रु भी , ब्लैक में , भैया के रजिस्टर में वेटिंग में नाम भी लिखवाना पड़ता था …एक दिन लेट हुए तो डबल पेनल्टी 🙂 ,

गज़ब दिन थे यार …. 

कॉमिक्स करंसी और स्टेटस सिम्बल था , पैसे बचाने के लिए एक्सचेज की जाती थीं , ‘मैं बिल्लू, तो तू पिंकी लेले भाई’ जैसी डील्स बचपन में सीख ली गई थी (बार्टर सिस्टम) , और जिसके पास  खरीदी हुयी कॉमिक्स हो तो वो तो  ग्रुप का सबसे अमीर बच्चा और उसका गज़ब वट/ प्रभाव हुआ करता था | 

 

आपको पता है इसका सबसे बड़ा फायदा क्या हुआ था उस पीढी को ?

उनकी हिंदी पढ़ने की क्षमता और उनका ज्ञान बाहरी दुनिया के प्रति , अच्छे बुरे की समझ और हीरोज़ के गुणों को अपने में ढालने का जोश …ये सब अपने आप अप्रत्यक्ष रूप से होता था |

आज भी देख लीजिये जिसने कॉमिक्स पढी हैं उनके हिंदी भाषा के प्रति अनुराग और ज्ञान को, उनकी स्मरण शक्ति , वे बड़े पुराने डायलॉग आज भी बोल देंगे ….

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कंप्यूटर शब्द पहली बार मैंने भी चाचा चौधरी की कॉमिक्स में ही पढ़ा था , हांलाकि आज में इसी क्षेत्र में करीअर बना चुका हूँ पर डायमंड कॉमिक्स ने मुझे पहली बार मेरे शब्दकोष में इसकी इंट्री की थी …

साथ ही बिना डिस्कवरी चैनल / टीवी के बच्चों को उड़न-तश्तरी (UFO), साइंस लैब्स, क्लोन्स, एस्ट्रोनामी, देश-विदेश और नैतिक शिक्षाओं का साधन वो भी उनके पसंदीदा माध्यम से मिलता था | मैंने कई क्रान्तिकारीयों  और साधू-संतों , महापुरुषों के बारे में बडे नज़दीक से इन्ही कॉमिक्स से जाना  है |

हम लोग कॉमिक्स में घुसे रहते थे (वोरेशियस रीडर्स), रजाई में दुबक के , टॉर्च की रौशनी में (फोन की एलईडी नहीं थी )  

सुपर कमांडो ध्रुव की लॉजिकल ट्रिक्स , नागराज की फ्लाइंग किक , चम्पक की कहानियाँ , मधुमुस्कान के अंक का इंतज़ार, और चाचजी के दिमाग का कंप्यूटर से भी तेज़ चलना, साबू के गुस्से पर जुपिटर पर ज्वालामुखी फटना , पिंकी के आते ही झपट जी का पलंग के नीचे दुबकना और बिल्लू और बजरंगी पहलवान की शरारतें  ये सब दोस्तों,   आज  बेहद याद आता है | 

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क्रुकबांड जैसा जासूस ना हुआ ना होगा , फैंटम का थ्रिलर ,  महाभारत के चरित्रों की अमर चित्रकथा और उनके ज़बरदस्त इलस्ट्रेशन / चित्रों का इम्पेक्ट आज भी इस बहुत स्मार्ट दिमाग होने का भ्रम लिए हुए व्यक्तित्व के नीचे दबा हुया है पर जब भी ये बाहर आता है , मीठे मौसम के पहले आमरस को खाने की तरह  मन उछलने लगता है और अपने यादों में ही दोस्तों और उन गलियों में पहुँच कर सुकून पाता  है | 

 

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कुछ लाइंस जो बडी फेमस हुई थी :  

  • चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है |
  • जब साबू को गुस्सा आता है , तो कहीं ज्वालामुखी फटता है | 
  • साबू जुपिटर का निवासी है |
  • फैंटम – चलता -फिरता प्रेत |
  • ध्रुव – बचपन में गोल्डन जुबली सर्कस का कलाकार था 
  • राका ने अमर रहने का केमिकल पे रखा है | 
  • नागराज के शरीर में १०००० से ज्यादा नागों का ज़हर है | 

ऐसी बहुत लाइन्स हैं जो बाकी हैं, चाहता हूँ की आप कमेट्स में उन्हें लिखें और अपनी जुगाली को जारी रखें ……..

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इनके अलावा चम्पक, मधुमुस्कान, लोटपोट, सुमन -सौरभ, नंदन , टिंकल कितना अच्छा साहित्य था, जो भाषा पर पकड़ देता था , नैत्क मूल्यों को बढाता था, साहित्य और कला से जोड़ता था , इतिहास की समझ बढाता था …कुछ  दिन पहले रेलवे स्टेशन पर एक ठेला देखा उसमे जो पुस्तके/ पत्रिकाएं रखी थी वे बेहद ही घटिया और बच्चों के लिए तो थी ही नहीं , उनका नाम लिखना भी उचित नहीं …

 

हांलाकि आज भी मिल रही है कॉमिक्स, पर बहुत कम , वो दौर अब नहीं लौटेगा शायद, आज इन्टनेट पर ढूँढ़ रहा हूँ बचपन को , मतलब कॉमिक्स को…. 

 

आपके कमेंट्स , फीडबैक और जवाब की प्रतीक्षा रहेगी |

समीर शर्मा | 9755012734 

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