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Exhibition Review by Avadhesh Yadav – “कांफ्लुएंस” विविधता के चित्र

“कांफ्लुएंस”  विविधता के चित्र – एग्जिबिशन रिव्यू 

इंदौर शहर कई मायनों में एक महानगर कहलाने लायक है. उसी तरह संस्कृति एवं कला के क्षेत्र में भी हमारा शहर उतना ही चर्चित रहा है. पिछले कुछ वर्षों में इंदौर का चित्रकला संसार कुछ रवां हो चला है. निजी तथा सार्वजनिक सब मिला कर शहर में चार कला  वीथिकाएं हैं. इनमें सबसे नयी आर्ट गैलरी केनेरीज है, जहां फिलहाल एक समूह कला  प्रदर्शनी कांफ्लूएंस जारी है , (लगभग और ३ दिनों तक, २५ जून तक ) . 

 

प्रदर्शनी में अठारह चित्रकारों के चित्र देखे जा सकते हैं, जो इंदौर के अलावा दिल्ली, नागपुर, मुंबई, धार, बंगलूरू  आदि नगरों से आते हैं.|

इस प्रदर्शनी की एक विशेषता इसकी विविधता है. शैलियों के स्तर पर अमूर्त, आकृतिमूलक शैलियों में बने चित्र इसमें शामिल हैं.

 

इनमें तीन कलाकार ऐसे हैं जो अतिथि हैं एवं जिनका इंदौर से सीधा सम्बन्ध नहीं हैं सुरेश,  पुश्पंगाथन और प्रवीण स्वर्णकार.

प्रवीण के चित्र में आसमानी रंग कि हलकी छटाओं के साथ एक खलिश में तैरता फंतासी का संसार है, जिसमें बिल्ली का चरित्र अतियथार्थवादी ढंग से दर्शक को अपने खेल में शामिल करता लगता है. आकृतियों के साथ रोज़मर्रा की चीज़ों तथा काल्पनिक संसार का मेल-जोल दिलचस्प है.

सुरेश अपने  चित्र में प्रकृति को अपने विशेष ढंग से दिखाना चाहते हैं, जिसे देखकर थोड़ा आश्चर्य यह सोचते हुए होता है कि कमल-ताल के चित्र में कमल के फूल लगभग नदारद हैं, यथार्थवादी शैली में रचित यह चित्र सुरेश के यथार्थ को तफसील से चित्रित करने का उनका अंदाज़ बखूबी दर्शाता है.

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महुआ रॉय मल्होत्रा दिल्ली से हैं, जिनके कागज़ पर रेखांकन कहीं अतियथार्थवादी ढंग से मांसपेशियों की छवि की तरह लगते हैं तो कभी किसी ठोस आकार का पूर्वाभास कराते लगते हैं.

 

तृप्ति जोशी का चित्र औद्योगिक क्रांति के समय में अस्तित्व में आई मोटर कार को एक ऐसे परिवेश में दिखाता है जहां वह हवा में स्थिर सी दिखाई देती है, पुरानी वस्तुओं को इस तरह चित्रित करते हुए तृप्ति दर्शको का ध्यान भूली- बिसरी चीज़ों की ओर अपने ढंग से ले जाती हैं.

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राहुल सोलंकी कोलाज में तकनीकी रूप से सिद्धहस्त हो चुके हैं, राहुल अपने चित्र -फलक उसकी सतह के साथ प्रयोग कर रहे हैं, जिसके तहत उन्होंने कोरोगेटेड गत्ते पर पतंग-कागज़ से कोलाज किये हैं, जिसमें प्रमुख रूप से सफ़ेद रंग के साथ काले और किंचित लाल रंग से रूप-आकारों का निर्माण किया है.

 

मोनिका लागू सोलंकी मोनो प्रिंट( विभिन्न वस्तुओं से छापा लेना) विधा में टेक्सचर और अमूर्त आकारों को हलके रंगों में खोज रही हैं. पतंग-कागज़ से ली गई छापों के कारण यह चित्र कोलाज से भी प्रतीत होते हैं.

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विशाल जोशी  के चित्र में पूरे चित्रफलक में एक मात्र रूपाकार  को सुनहले रंग में गहरी पार्श्वभूमी पर छाया-प्रकाश के साथ बरता गया है, यह रूपाकार ठोस और भारी लगते हुए भी अवकाश में स्थित लगता है. इस चित्र में टेक्सचर के उपस्थिति महत्वपूर्ण है.
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प्रीता गडकरी ने अपनी नयी चित्र श्रंखला में बंद किवाड़ों का चित्रण किया है. नीले रंग के इन किवाड़ों के प्रमुख भाग जहां कुंदा लगा होता है, उसे ही संयोजन में शामिल किया गया है. चटख नीले रंग किवाड़ों के पीछे के संसार की कल्पना जगाते हैं.

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सतीश भैसारे योजनाबद्ध ढंग से रंगों के छींटे लगाते हुए अपने चित्र को अंजाम देते हैं, रंग लगाने के इस ढंग से सतीश के चित्रों को एक तरह की ऊर्जा प्राप्त होती है और एक वितान भी.

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दुर्गेश बिरथरे के चित्र किसी विशेष रूपाकार को ग्रहण न करते हुए एक स्वच्छंद बहाव की तरह दिखाई पड़ते हैं, यहाँ प्राकृतिक भू-दृश्य की भी प्रतीति होती है. दुर्गेश रंग की छोटी-छोटी बिंदियों से इस दृश्य तक पहुँचते हैं.

 

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सुमित शिंदे ठोस एवं तरल रूपों के साथ प्रमुखतया गहरे रंगों से अमूर्त चित्र बनाते हैं. कहीं -कहीं लगाये गए रंगों के प्रभाव से इन चित्रों में स्वप्निल परिवेश उजागर होता जाता है.
गोविन्द बिस्वास का चित्र फलक काफी व्यस्त होता है, उसमें किसी प्रमुख आकृति के साथ- साथ पार्श्व में हवाई मानचित्र दिखाई देता है तो साथ ही ज्यामितीय आकार और एक दूसरे में गुंथीं हुई रेखाएं भी होती हैं.

 

परिश्रम के साथ बनाये इन चित्रों के कई अर्थ बनते जाते हैं.

 

शशि भारती के नए चित्रों में सपाट रंग का पार्श्व प्रमुखता से लक्ष्य होता है , जिसके दायें भाग में सशक्त ब्रश-स्ट्रोक्स के माध्यम से एक दूसरे का अतिक्रमण करते हुए कई ज्यामितिक  आकार बनाये गए हैं. जो किसी बड़े रूपाकार के चित्र में रहे आये हिस्से प्रतीत होते हैं.

 

प्रीति मान मधुमक्खी के छत्ते की तरह ही छोटे आकारों को मिलाकर एक विशाल रूप विधान रच रही हैं. उनके ये आकार अन्तरिक्ष में गतिशील पिंडों जैसे लगते हैं.

मोहित भाटिया बहुत सारे उभरे आकारों पर एक रंग की हलकी परत चढाते हैं. रंग लगाकर पोंछने के कारण उभरे ये रूप मद्धिम लय उपजाते हैं. किसी खुरदुरी दीवार में बरबस बन आये पैटर्न्स की तरह इनमें हर बार कुछ नया दिख जाता है.

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भूपेन्द्र सिंह के बहुत सारे चटख और काले रंगों के स्ट्रोक्स से भरे चित्र किसी शहरी बस्ती के ऊँचाई से देखे दृश्य की तरह दीखते हैं. भूपेन्द्र अपनी चित्र मेधा से दृश्य को एकरैखिकता से मुक्त करके उसे एक चाक्षुष अनुभव में बदल देते हैं.

 

नितीश भट्टाचार्जी के कागज़ पर बनाये छोटे चित्र उनकी चिर-परिचित शैली को इंगित करते हैं.

 

 

विजय काले मांसल काया वाले मिथकीय चरित्र कुछ धूसर रंगों के साथ  अपने चित्र में शामिल करते हैं. चित्रों की पार्श्व भूमि प्राचीन लिपि के प्रभावों से भरी है. विजय का रेखांकन कौशल चित्रों में साफ़ देखा जा सकता है.

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इस प्रदर्शनी में इंदौर और मालवा क्षेत्र के कलाकारों और अन्य शहरों से शामिल चित्रकारों की विविधता प्रदर्शनी को रुचिकर आयाम देती है.

 

यह चित्र अवधेश यादव द्वारा प्रदर्शित किये गये थे | 

  • अवधेश यादव | avas06@gmail.com

नोट:

यह समीक्षा लेखक के  व्यक्तिगत विचार हैं, इस समीक्षा के लेखक अवधेश यादव इंदौर के जाने-माने चित्रकार , आर्ट टीचर और रज़ा अवार्ड से सम्मानित कलाकार हैं |  सभी चित्र उपलब्ध ना हो पाने से कुछ चित्र ही प्रकाशित हुए हैं | यदि कोई चित्र हमें ohindore@gmail.com पर भेज दें तो हम उसे एडिट कर इस रिव्यू में शामिल कर देंगे !

 

ऐसी ही कला, लेखन और नाट्य समीक्षाएं हम ओहइंदौर.कॉम पर अब जारी रखेंगे | आपके सुझावों से यह पोर्टल और बेहतर होता जा रहा है | इस प्रेम को बनाय रखें |

टीम ओहइंदौर !

 

वामन हरी पेठे, इंदौर

About Sameer Sharma

Founder and Editor, www.ohindore.com

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