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Founder of Indore City – इंदौर के संथापक : जानिए राव राजा राव नंदलाल जी मण्डलोई के बारे में

समीर शर्मा | इंदौर

Indore | इंदौर 

आज ३ मार्च को बना था यह व्यावसायिक शहर इंदौर 

राव राजा राव नंदलाल जी मण्डलोई | फाउंडर , इंदौर सिटी 

 हम सब अपने-अपने इन्दोरिपन और इंदौर शहर का हम पूरी दुनिया में दम भरते हैं उस इंदौर को किसने स्थापित किया ?कौन है वो जिसने इंदौर बनाया , बसाया , चलाया और किसने इंदौर को होलकर राज्य दिलाया …

कौन हैं राव राजा राव नंदलाल जी मण्डलोई ?

राव राजा नंदलाल मंडलोई

इन्दौर शहर के संस्थापक राव राजा नन्दलाल चौधरी (नन्दलाल मण्डलोई) इन्दौर के कम्पेल क्षेत्र के शासक थे।  

सन १७०० में मुग़ल शासक आलमगीर की मुहर की सनद से राव नंदलाल जी को उनके पिता राव चूड़ामण जी की मृत्यु के बाद यहां का शासक घोषित किया गया।  राव राजा नंदलाल जी मंडलोई (ज़मींदार) का शासनकाल कम्पेल एवं इंदौर के विकास का स्वर्णिम काल रहा है जिसमे संमृृद्धि के नए आयाम स्थापित हुए। राव राजा नंदलाल जी का प्रशासनिक मुख्यालय महाल कचहरी से चलता था जो की जूनी इंदौर के परकोटे के अंदर थी।

 

रावला (मंडलोई) इंदौर में मंडलोई परिवार है जो मूलत: श्रीगौड़ ब्राह्मण हैं। मालवा में आ बसने से ये श्रीगौड़ मालवीय कहलाए। ये मुगलों के पदाधिकारी हुआ करते थे। 15वीं-16वीं सदी में सूवा मालवा, उज्जैन सरकार, पहगना देपालपुर और कस्बा इंदौर कहलाता था। इंदौर एक छोटा कस्बा था जिसका मुख्यालय कंपेल हुआ करता था। इस परिवार के मूल पुरुष बलराम चौधरी थे। रावला परिवार के पास अक्टूबर 1664 की सनद है|

 

इन्ही के नाम पर है नंदलालपुरा 

राव राजा नंदलाल जी ने ही सन १७१५ में उस परकोटे के बाहर पहली आवासीय बस्ती की नींव रखी, जिसे अपने नाम के आधार पर नंदलालपुरा नाम दिया गया जो आज भी मौजूद है। इंदौर की बसाहट में रावला (मंडलोई) परिवार की भूमिका अहम है।  

कैसे बनाया  इंदौर को बिजनेस सिटी?

केंद्र सरकार द्वारा देश के किसी हिस्से को स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) बनाने की योजना का खाका नया नहीं, बल्कि 300 साल पुराना है। मुगलों के शासन के दौरान ही इसकी नींव पड़ गई थी। जिसका पूरा श्रेय जाता है इंदौर शहर के संस्थापक राजा राव नंदलाल मंडलोई को।

300 साल पहले बनाया था टैक्स फ्री जोन

3 मार्च 1716 को इंदौर के राजा राव नंदलाल मंडलोई ने मुगल बादशाह से फरमान हासिल कर इंदौर को टैक्स फ्री जोन बनाया था।

राव राजा नंदलाल जी ने इस स्थान की आर्थिक उन्नति एवं व्यावसायिक विकास से चिंतित होकर मुग़ल बादशाह से सायर (करमुक्त व्यापार) की अनुमति मांगी। फलस्वरूप ३ मार्च १७१६ को मुग़ल बादशाह द्वारा यहां सायर (करमुक्त व्यापार/ टैक्स फ्री जोन )  की सनद द्वारा अनुमति प्रदान की गयी जिसके कारण यह क्षेत्र चौतरफा उन्नति करता हुआ मध्य भारत का व्यावसायिक केंद्र बना और आज वर्तमान में भी है।

फिर ऐसे बना इंदौर एक होलकर स्टेट ?

यह सब राव राजा नंदलाल जी मंडलोई दूरदर्शिता एवं अथक प्रयासों के कारण ही संभव हुआ। इस स्थान की समृद्धि कई डाकुओं, पिण्डारियों, आसपास के सूबेदारों एवं राजाओं को खटकने लगी और लूटपाट के लिए लगातार आक्रमण होने लगे। उन्होंने उन सभी का डटकर मुकाबला किया। इस समय तक मुग़ल शासक की पकड़ ढीली हो गयी थी और पेशवा उत्तर की ओर बढ़ रहे थे।

मालवा में शान्ति स्थापित करने के लिए और जन जन को लूटपाट से बचाने हेतु उन्होंने बाजीराव पेशवा बलाल से संधि की । कालांतर में यहाँ पेशवा राज्य स्थापित हुआ जिसके सूबेदार होलकर बने।

इंदौर होकर अपना शासन आगे बढ़ाने के लिए पेशवाओं ने अपने सूबेदार मल्हाराव होलकर की मदद लेकर रावराजा नंदलाल मंडलोई से मित्रता कर ली।

पुरातत्व विभाग में उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक 1732 में मल्हारराव होलकर को इंदौर की की जागीरदारी सौंपी गई लेकिन तब भी शासक रावराज नंदलाल मंडलोई ही थे। इसमें इंदौर के नौ गांव शामिल थे और कंपेल का मुख्यालय भी होलकरों के अधीन था। अहिल्याबाई के समय तक कचहरी महल कंपेल का उपयोग किया गया।

मल्हारराव होलकर ने इंदौर आगमन के बाद एक दूसरी बस्ती भी बनाई जिसे मल्हारगंज कहा जाता है। 1742 में राजवाड़ा का निर्माण प्रारंभ किया जो 1747 में पूरा हुआ। होलकरों ने इसके बाद मुख्यालय कंपेल से इंदौर स्थानांतरित कर लिया।

बड़ा रावला- जहां राव राजा नंदलाल मंडलोई के वंशज आज भी रहते हैं:

इस परिवार ने अपने इतिहास को सहेजा है और इसकी एक वेबसाईट भी उपलब्द्ध है 

http://www.raorajaofindore.com

 रावला के मंडलोई परिवार के पास अभिलेखों का एक बड़ा संग्रह है जो मंडलोई दफ्तर कहलाता है। इसमें अधिकांश अभिलेख फारसी में है। रत्नागिरी के शोधकर्ता आठले ने इस पर शोध कार्य किया है। ग्वालियर के भास्कर रामचंद्र भालेराव के पास भी इन अभिलेखों की प्रति और देवनागरी में अनुवाद भी है।

बड़ा रावला और जमींदार (मण्डलोई )परिवार

रावला मंडलोई परिवार के निवास को गढ़ी कहा जाता है। यह 18 वीं शती ईस्वी की चोकोर आकार की उंचे टीले पर बनी है। इसका प्रवेश द्वारा दो मंजिला मेहराबदार है। गढ़ी में बेसाल्ट पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। इसके चारों कोनों पर बुर्ज सुरक्षा मोर्चे हैं। यह मंडलोई परिवार के निवास के लिए हुआ करता था जिसमें महल के साथ ही घुडसाल, हाथीखाने बगैरह बने हुए थे। महल के निर्माण में पाषाण के साथ लकड़ी ईंट व संगमरमर का उपयोग हुआ है।

वर्तमान के राव राजा श्रीकांत मंडलोई ज़मींदार

तो ये है इंदौर की कहानी, आपको यह  कैसी लगी , हमें ज़रूर बताएं अपने कमेंट्स के साथ 

हमारा प्रणाम इस शख्सियत को जिसने हमें इंदौर दिया |

समीर शर्मा | इंदौर 

ohindore@gmail.com

वामन हरी पेठे, इंदौर

About Sameer Sharma

Founder and Editor, www.ohindore.com

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