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गीता के इन पांच श्लोकों का ज्ञान और अर्थ आपको सीधे श्रीकृष्ण के पास ले जायेगा …

सुनिए प्रभु श्रीकृष्ण की…

 

गीता में श्रीकृष्ण के अनुसार अनेक प्राकर के दुर्लभ ज्ञान मनुष्यों को दिये गये है | आज हम सप्तम अध्याय से कुछ महत्वपूर्ण शिक्षाओं को पढेंगे और उनके अर्थ को सच्चे अर्थों में समझेंगे | आज आपके मानस  पटल को झझकोर देने वाले ५ गीता श्लोकों को पढेंगे और समझेंगे ….

देवता , पूजन , मूर्तीपूजा  इन तीन शब्दों , जिन्होंने समाज जो आज एक अन्य ही दिशा दे दी है , इस  बारे में प्रभु श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन उन्ही के शब्दों से प्राप्त करें किसी अन्य के नहीं ….

 

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सप्तम अधयाय में १९ वे श्लोक २३ तक  प्रभु श्रीकृष्ण समझाते हैं  कि

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बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ (१९)

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अर्थात बहुत सारे अथक प्रयोसों , जन्मों , मानसिक स्तरों को पार कर अंत में मनुष्य को यही ज्ञात होगा कि “मैं”  यानि की ईश्वर ही सबकुछ है , और वह सिर्फ मुझे , सभी को छोड़कर सिर्फ मुझे ही भजता है और जिसे यह समझ आ जाये ,  ऐसी महान आत्मा बहुत दुर्लभ होती है |

अर्थात : श्रीकृष्ण ईश्वर के अवतार हैं , अत: जब भी वे कुछ बोलते हैं तो वे ईश्वर की और से बोल रहे होते हैं , यानि ईश्वर आपसे जो कहना चाहते हैं उसका माध्यम सद्गुरु अवतार होते हैं ,  कृष्ण कहते हैं कि यहाँ यह जान लेना आवश्य है कि ईश्वर के अलावा कसी को भी भजना वर्जित है, और वह भी उनके गुणों के स्वरूप में न कि प्रतिमा स्वरुप . यहाँ ईश्वर के गुणों के बारे में कहा गया है , दैवीय गुण जैसे आध्यात्मिकता, सच्चाई, दयालुता, ईमानदारी, विश्वास्पात्रता , ज्ञान आदि जो ईश्वर के गुण है |

 

अगले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण एक बहुत गूढ़ अर्थ को समझा रहे हैं जिसको समझने में अधिकाँश भक्त फंस जाते हैं और प्रभु से ही दूर हो जाते हैं , कृष्ण  पहली बार देवताओं के बारे में कह रहे हैं ..

 

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।

तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ (२०)

जिन मनुष्यों का ज्ञान और विवेक  सांसारिक कामनाओं के द्वारा नष्ट/ अपहृत  हो जता है  है, वे लोग अपने-अपने मूढ़ स्वभाव के अनुसार मानसिक प्रकृतिवश  में होकर अन्य देवी-देवताओं की शरण में जाते हैं। ध्यान रहे , यहाँ अन्य देवी देवताओं का प्रसंग पहली बार दिया गया है |

प्रभु फिर आगे कहते हैं कि :

 

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्‌ ॥ (२१)

 

जैसे ही कोई भक्त कामी (सांसारिक कामनायों से भरा हुआ ) होकर जिन-जिन देवी-देवताओं के स्वरूप को श्रद्धा से पूजने की इच्छा करता है, मैं उसकी श्रद्धा को उन्ही देवी-देवताओं के प्रति स्थिर कर देता हूँ।  

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अब समझने वाली बात यह है कि यह आशीर्वाद है या श्राप ?

मित्रों यहीं पर, हम यदि किसी अन्य की शरण में जा रहे हैं तो हम मूलतत्व , यानी हमारे सृष्टिकर्ता ईश्वर से दूर होकर किसी अन्य दिशा में मुड चुके हैं यह हमारे लिए किसी दंड से कम नहीं ….ये वैसा ही है जैसे महाभारत में दुर्योधन ने भगवान् श्रीकृष्ण की जगह अन्य वस्तुओं और कामनाओं को चुन लिया था और वहीँ वह ईश्वर से दूर हो गया था |

आज भी देखते हैं हम कि किस तरह नए नए और काल्पनिक देवी देवताओं , प्रतीकों , बाबाओं , मानव गुरुओं के रूप में अवैज्ञानिक मानकों को हम पूजते चले जा रहे हैं और कृष्ण और उनका ज्ञान कहीं पीछे छूट गए हैं हमसे , और हमारी ही ईच्छा से , क्यूंकि यदि हम चाहते तो उनके दिए इस गीता ज्ञान को समझ कर हम उनके पास ही रहते , अपने दर्पण को सूर्य की जगह किसी अन्य दिशा में करके प्रकाश की अपेक्षा की मूर्खता नहीं करते |

 

गुरु मानव नहीं दिव्य होता है और केवल ईश्वर अवतार ही सच्चे गुरु , मानव शिक्षकों को सद्गुरु ना समझे …

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तो ईश्वरीय अवतार को बिसरा कर विभिन्न देवी देवताओं में मन / श्रद्धा लगाना सही है या गलत , वर है या श्राप ?

 

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अब आगे सुनिये कृष्ण और साफ़ करते हैं कि देवता की परिकल्पना ही मूर्खता है और ऐसा कुछ नहीं होता …

 

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।

लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌ ॥ (22)

वह भक्त सांसारिक सुख की कामनाओं से श्रद्धा से युक्त होकर उन देवी-देवताओं की पूजा-आराधना करने लगता  है और उसकी वह कामनायें पूर्ण भी होती है,  और वास्तव में यह सभी इच्छायें मेरे द्वारा ही पूरी की जाती हैं। क्यूंकि मैं उसकी श्रद्धा को वहीँ स्थिर कर देता हूँ !

समझने की बात है कि वह हमें सांसारिक सफलता , पैसा , समृद्धि में  स्थिर कर देते हैं और हमारी आध्यात्मिक प्रगति का पटाक्षेप हो जाता है और यह भी ईश्वर की ईच्छा से है क्यूंकि आप चाह जो रहे हैं , ईश्वर वो ही दे रहा है …ताकि आप उसमे रम जाएँ , परन्तु मित्रों यह आशीर्वाद नहीं दंड है …..

 

इसके बाद प्रभु के अवतार इस विषय को एक दम साफ़ कर देते हैं अगले श्लोक में :

 

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌ ।

देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ (२३)

 

परन्तु ऐसे उन अल्प-बुद्धि वालों को प्राप्त वह फल क्षणिक (सांसारिक) होता है और भोगने के बाद यहीं समाप्त हो जाता हैं, देवताओं को पूजने वाले देवलोक को प्राप्त होते हैं किन्तु मेरे भक्त अन्तत: मेरे परम-धाम को ही प्राप्त होते हैं। आप अगले लोक में कुछ नहीं ले जा पाते हैं | देवता को पूजने वाले नाशवान हैं अर्थात देवता भी नाशवान हैं | और इश्वर को पूजने वाले शाश्वत और ईश्वर भी शाश्वत , जिसका आदि न अंत …

 

देवता शब्द की उत्पत्ति  हुई दिव्य + तत्त्व से जो बाद में अपभ्रंश हो कर देवतत्त्व बना और बाद में देवत और फिर देवता , यहाँ इस शब्द का अर्थ दिव्य तत्त्व यानि दिव्य मतलब ईश्वरीय और तत्त्व मने गुण या विशेषता , अर्थात ईश्वरीय गुण से था पर समय के साथ साथ बिचोलियों ने इसका अनर्थ किया और देवता को एक आकार प्रदान कर अपना व्यवसाय प्रारम्भ कर दिया | यदि किस भी प्रकार के देवता होते  तो श्री राम, कृष्णा आदि उन सभी को पूजने को कहते ईश्वर को नहीं |

 

 

 

यहाँ समझाने वाली बात यह है कि सांसारिक सफलता के लिए अन्य दिशा में की गई आराधना का फल जो हमें अच्छा लगता है उसके फल यही नष्ट हो जाते हैं और हमें ईश्वर के परम धाम तक नहीं ले जा पाते हैं | क्यूंकि यदि आप ईश्वर को ईश्वर के अवतार के माध्यम से पूजते तो अवश्य ही परम धाम जाते , आपने एक देवता परिकल्पना जिसका उल्लेख श्री मद भाग्ताद गीता में कही नहीं किया गया है |

 अत: अब हमें ईश्वर , ईश्वरीय अवतार , दिव्य तत्त्व यानि ईश्वरीय गुणों के बारे में मनन करना चाहिए और उस एक अविनाशी की ही आराधना करनी चाहिए | पाखण्ड और पाखंडियों से दूर होकर ईश्वर के नज़दीक आना ही गीता का मर्म है |

 

कृष्ण यानि की ईश्वरीय अवतारों से दूर जाने की भूल न करें, उनकी आराधना उनके गुणों के रूप में अपने जीवन में ढाल कर करें न की कर्मकांडों के रूप में , कृष्ण स्वरुप बने “अहम् ब्रम्हास्मि ” को समझें  …

 

आप अपने प्रश्न और विषय बताएं और इस अध्ययन वृत्त को आगे बढ़ाएं |

 

समीर शर्मा

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Founder and Editor, www.ohindore.com