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उज्जैन में महाकाल की शाही सवारी : क्यूँ निकलती है सावन में ?

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आज सोमवार के दिन बाबा महांकाल की नगरी उज्जैन में श्रावण-भादौ मास में भगवान महाकाल की पहली  शाही सवारी शहर में निकलेगी। इस दौरान भक्तों को अवंतिकानाथ के छह रूपों में दर्शन होंगे। जानकारी के अनुसार, महाकाल मंदिर से शाम 4 बजे राजाधिराज की पालकी नगर भ्रमण के लिए रवाना होगी। परंपरागत मार्गों से होकर सवारी शिप्रा के रामघाट पहुंचेगी। याहां शिप्रा जल से भगवान का अभिषेक पूजन होगा. इसके पश्चात सवारी पुन: रवाना होगी तथा रात करीब 10 बजे मंदिर पहुंचेगी।

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सवारी का टाइमटेबल 

पहली सवारी १० जुलाई,
दूसरी सवारी १७ जुलाई,
तीसरी सवारी २४ जुलाई,
चौथी सवारी ३१ जुलाई,
पांचवी सवारी ७ अगस्त,
छटी सवारी १४ अगस्त और
प्रमुख शाही सवारी २१ अगस्त को निकाली जाएगी।

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सावन महोत्सव हर रविवार को

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सावन मास में हर रविवार महाकाल मंदिर में सावन महोत्सव भी आयोजित किया जाता है जिसमें देश भर के ख्यात संगीतकार महोत्सव में शिरकत करते हैं। इस बार सावन महोत्सव १६ जुलाई, २३, ३० जुलाई, ६, १३, एवं २० अगस्त को मनाया जाएगा।

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क्यूँ निकलती है महाकाल की सवारी  ?

मान्यता है कि महाकाल सवारी के जरिए अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं क्योंकि महाकाल को उज्जैन का राजा माना जाता है। सवारी से पहले पुजारी मुघौटे सम्मुख रख महाकाल से इनमें विराजित होने का आह्वान करते हैं। पश्चात सवारी निकलती है। ऐसा इसलिए ताकि हर रूप में हर भक्त भगवान के दर्शन कर सके। खासकर वे जो वृद्ध, रुग्ण या नि:शक्तता की स्थिति में मंदिर नहीं आ सकते।

श्रावण-भादौ मास में भगवान महाकाल हर सोमवार को विभिन्न रूपों में विविध वाहनों पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं। भक्त इन रूपों की एक झलक पाकर ही निहाल हो जाते हैं। पहले सोमवार को पालकी में चंद्रमौलेश्वर निकलते हैं। दूसरी सवारी में चंद्रमौलेश्वर हाथी पर और पालकी में मनमहेश विराजते हैं। इसके बाद क्रमश: नंदी पर उमा-महेश, गरुड़ पर शिव-तांडव, बैल जोड़ी पर होलकर, जटशंकर रूप में भगवान दर्शन देते हैं।

 

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पालकी में भगवान के नगर भ्रमण की परंपरा अनादिकाल से मानी गई है। सिंधिया स्टेट के समय अन्य रूपों को सवारी में शामिल किया गया। प्रजा अपने राजा से मिलने के लिए इस कदर बेताब होती है कि शहर के चौराहे-चौराहे पर स्वागत की विशेष तैयारी की जाती है। शाम चार बजे राजकीय ठाट-बाट और वैभव के साथ राजा महाकाल विशेष रूप से फूलों से सुसज्जित चाँदी की पालकी में सवार होते हैं। जैसे ही राजा महाकाल पालकी में विराजमान होते हैं। ठंडी हवा के एक शीतल झोंके से या हल्की फुहारों से प्रकृति भी उनका भाव भीना स्वागत करती है स्थानीय प्रचलित भाषा में इसे सावन के ‘सेहरे’ कहा जाता है ।

साभार उज्जैन.कॉम 

 

 

 

 

वामन हरी पेठे, इंदौर

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