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कविता साम्राज्ञी महाश्वेता देवी जी के ९२वें जन्मदिवस पर उनकी एक बहुत ही भावपूर्ण रचना

#MahaShwetaDevi

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आ गए तुम …

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यह कविता हर उस स्त्री के मन का दर्पण है , जो अपना जीवन अपने साथी के लिए समर्पित करती है पर भावनाएं मन में ही रख कर सिर्फ प्रेम व्यक्त करती है , भारतीय नारी के इस महान रूप को और सामान्य पुरुष के दम्भी और लौकिक सतही प्रेम को दर्शाती यह कविता झजकोर देती है …

शरीर की सतह के नीचे एक कोमल मन है उस स्त्री का जो देख पाना और सहेजना , समझना भागीरथी काम है ….

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श्रद्धांजलि और स्मरण जन्मतिथि पर महाश्वेता देवी को … 

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आ गए तुम,
द्वार खुला है अंदर आओ…!

पर तनिक ठहरो,
ड्योढ़ी पर पड़े पाएदान पर
अपना अहं झाड़ आना…!

मधुमालती लिपटी हुई है मुंडेर से,
अपनी नाराज़गी वहीं
उँडेल आना…!

तुलसी के क्यारे में,
मन की चटकन चढ़ा आना…!

अपनी व्यस्तताएँ,
बाहर खूँटी पर ही टाँग आना।
जूतों संग हर नकारात्मकता
उतार आना…!

बाहर किलोलते बच्चों से
थोड़ी शरारत माँग लाना…!

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वो गुलाब के गमले में मुस्कान लगी है,
तोड़ कर पहन आना…!

लाओ अपनी उलझनें
मुझे थमा दो,
तुम्हारी थकान पर
मनुहारों का पंखा झुला दूँ…!

देखो शाम बिछाई है मैंने,
सूरज क्षितिज पर बाँधा है,
लाली छिड़की है नभ पर…!

प्रेम और विश्वास की मद्धम आँच पर
चाय चढ़ाई है,
घूँट घूँट पीना,
सुनो, इतना मुश्किल भी नहीं है जीना…!

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-महाश्वेता देवी 

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महाश्वेता देवी का नाम ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियां आंखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। दरअसल उन्होंने मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया।

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– समीर शर्मा 

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About Sameer Sharma

Founder and Editor, www.ohindore.com

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