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मालवा के गौरव हास्य कवि स्व. ओम व्यास ओम की स्मृति में भांजे भुवन का श्रद्धांजलि आलेख

 

यादांजली …. मेरी “मामा” के साथ

बचपन में स्कूल और स्कूल के फाइनल परीक्षा का आखरी दिन, जितनी ख़ुशी परीक्षा के खत्म होने की नहीं उससे ज्यादा ख़ुशी उसी शाम को रोडवेज की बस में नानी के पास जाने की होती थी, उस टाइम रोडवेज की बस का सहारा था !

उज्जैन जहाँ नानी, नाना, 2 मामा और 2 मासियाँ ! प्यार बेशुमार मिलता था एक मात्र नाती और भांजा होने का !

हर फरमाईश पूरी की जाती थी फिर चाहे वह कुछ खाने की हो या नए खिलोने की ! हमारी नानी जान के हाथ का खाना आज भी मुह में स्वाद घोल जाता है उस पर मामा लोग के साथ बहार जाकर आइसक्रीम का लुफ्त उठाना !

ये सब चलता था पुरे 2 महीने जब तक स्कूल दोबारा न खुल जाये ! ये मेरे जीवन की सबसे बढ़िया यादें हुआ करती थी !

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फिर उम्र के साथ साथ पढाई हमारी खुशियों पर हावी होती गयी और उज्जैन की यात्रा कम होती गयी ! समय निकलता गया सब कुछ बदलने लगा , हम स्कूल के आखरी साल में थे और हमारा मन होटल मैनेजमेंट करने का था ! खूब मेहनत करके सबसे अच्छे कॉलेज में हमने एडमिशन हांसिल कर भी लिया पर आप जैसा चाहो वह कहाँ इतनी आसानी से नसीब में होता ! कुछ निजी कारण की वजह से हम नहीं जा पाए और इसका गुस्सा हमने घर छोड़ कर उज्जैन जा कर निकाल लिया ! अब कुछ करके ही आना ऐसे हार मान जाने वाले हम कहाँ ! उज्जैन जाकर हमने पढाई से ज्यादा जिंदगी के पाठ सीखे और वह हमने सीखे हमारे बड़े मामा “मुन्ना मामा “ से !  

यही कहते थे उनको असली नाम से तो पूरी दुनिया जानती ही जनाब उनको “हास्य कवि “पंडित ओम  व्यास “ओम ” ! हमारा भी नया नाम करण कर दिया गया था मामा द्वरा “ रामू “   

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मामा – ओम व्यास ओम

लम्बी चोटी, गोल चश्मा , लम्बा तिलक और मस्त सी तोंद जो देखे वह अपने आप को हँसे बिना न रोक पाए और उस पर रंग बिरंगे कुर्ते ! हम उनके पिछली ज़िन्दगी के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे क्यूंकि बचपन में थोडा डर लगता था उनसे , हाँ इतना पता था की BSNL में कार्यरत थे और ऑफिस से ज्यादा उनका भ्रमण पुरे हिंदुस्तान में होता था ! उनके साथ हमने भी खूब हिंदुस्तान देखा आखिर लालू प्रसाद ने उन्हें रेलवे का फ्री पास जो दे रखा था ! इन सब के अलावा मामा को उज्जैन में ऐसा कोई शख्स नहीं था जो नहीं पहचानता था बच्चा क्या और बड़ा क्या और बुद्धा क्या सब उनकी कलाकारी और वाक् शास्त्र से परिचित थे ! उनको उज्जैन में आप कभी अकले न तो घूमता पाएंगे न चाय पीते हुए हमेशा 4-5 लोग उन्हें घेर के खड़े रहते थे और चुटकुले बाज़ी के दौर चला करते थे ! उनके साथ बाज़ार जाना 2 मिनट के काम लिए मतलब गए आपके 2 घंटे !  

मामा की एक बात के हम कायल थे अगर उन्हें कोई कुछ बुरा भी बोल देता था तो वह मुस्कुराकर जवाब देते थे मगर अभी कडवी बात किसी के लिए नहीं निकलती थी उनके मुँह से और उनका ये अंदाज़ हम आज तक नहीं सीख पाए ! दूसरा जितनी बड़ी उनकी तोंद थी उतना ही अंदर से बच्चे वह किसी को इंजेक्शन तक लगते हुए नहीं देख सकते थे ! पर हाँ मदद के लिए उन्हें कह दिया तो वह उस इंसान की मदद अपने परिवार की तरह करते थे ! आदमी बड़े तबके का तो बात उस तरह की और छोटे तबके का तो उसके हिसाब से बात ! उनके किस्से आज भी कहीं न कहीं किसी के मुह से निकल ही जाया करते होंगे ! कहते है न “मामा” में 2 माँ होती है ये बात सच भी साबित हुई , मैंने अपने ननिहाल में 8 साल बिताये पढाई, काम , दुनियादारी सब सीखा वहां ! अच्छा, बुरा , मुश्किल हर तरह के वक़्त में अपने आप को ढालना सीखा ! उस घर का हिस्सा सा बन गया था में कभी अपने घर की कमी महसूस नहीं हुई, प्यार बेशुमार था और थोड़ी बहुत खींचतान किस घर में नहीं होती ! जिंदगी अच्छी कट रही थी, कहते ही न सब कुछ कभी एक सा नहीं रहता ! ज़िन्दगी को कुछ और ही मंज़ूर था !

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मामा के साथ – भुवन मेहता

7 जून की सुबह थी शायद 5 बजे होंगे मामा का कवि समेल्लन था भोपाल के आगे विदीशा में, उस दिन हमारा जन्मोत्सव होता हे ! मामा ने जाते जाते वादा किया की वापस आकर तुझे तेरे जन्मदिन के शर्ट दिलवाऊंगा ! हम वापस सो गए और मामा चले गए अपने कविसमेलन के लिए ! दिन सामान्य था रात में मामी ने बर्थडे के लिए ख़ास खाना बनया था ! पर कौन जनता था ये रात की शान्ति आने वाले भूकंप की आहट दबाये हुए है !

सुबह 4 बजे छोटे मामा मेरे पास भागते हुए आये, सुबह का समय सबसे ज्यादा अच्छी नींद का होता है ! मुझे धीरे से उठाकर कान में कुछ कहा जिसको सुनकर मेरी नींद के साथ साथ होंश उड़ गए ! ओम मामा की कार का विधिशा से वापस आते वक़्त एक्सिडेंट हो गया था और कौन किस हालत में था ये अभी तक किसी को नहीं पता था ! पर मन एक डर सा बैठ गया था , इतना मुझे अच्छे से पता था की मामा हमेशा ही आगे वाली सीट पर बैठते हैं और ड्राईवर की नींद न लग जाये इसलिए उसे चाय , तम्बाकू देते रहते थे ! इस बात ने और डरा दिया, संजय मामा (छोटे वाले ) को मै बड़े मामा के मित्र के यहाँ छोड़ कर आया पर घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी ! मैंने वहीँ से अपने मम्मी पापा को फ़ोन करके उज्जैन आने का बोला जिससे मेरी हिम्मत और घर में सबकी हिम्मत थोड़ी बनी रहेगी ! अब सवाल था घर पर सबको कैसे इस खबर से दूर रखा जाये मगर बात आग की तरह फेल गयी टीवी , अखबार और लोगों का मजमा घर के बाहर ! उस दिन एक बात तो पता चल गयी की मामा से पूरा उज्जैन और शायद हिंदुस्तान के बहुत लोग दिल से प्यार करते हैं !

 

पूरा देश और विदेश में भी लोग मामा के जल्दी स्वस्थ हो मंच पर लोटने की प्रार्थना में लग गए ! दुर्घटना भिषण थी और मामा की स्तिथि गंभीर ! घर में हवन , पूजा पाठ और सबकी दुआएं मामा के लिए दिन रात चल रही थी ! मैं भी हिम्मत रख के घर में नानी और बाकि सभी का ध्यान रख रहा था पर सहमा सा डरा हुआ सा ! रोज़ इस उम्मीद में सब उठते थे की आज दिल्ली से पप्पू मामा कुछ अच्छी खबर देंगे ! पर हर दिन एक और उम्मीद के साथ अस्त हो जाता था ! दिल्ली के अपोलो में माम का इलाज चल रहा था पप्पू मामा और बड़ी मामी दिन रात वहां रहकर बाकी सबके लिए आंख और कान बने हुए थे ! बड़े छोटों को और छोटे बड़ों को रोज़ हिम्मत दिया करते की सब ठीक हो जायेगा मगर मन ही मन सब डरे , सहमे , और कमज़ोर थे ! इन सब में नानी की हिम्मत देखने लायक थी जो खुद उम्र दराज़ होते हुए भी एक एक को होंसला भरपूर दे रही थी ! दिन गिनते गिनते कब महीना निकल गया पता नहीं चला !

मामा और मामी

पर कहते है न हर चीज़ इंसान के हाथ में आ जाये तो भगवान् को कौन पूछेगा, उसने कुछ और ही सोच रखा था और उसका सोचा किसी को नहीं पता होता ! 8 जुलाई की भोर दिल्ली के अस्पताल में मुन्ना मामा ने आखरी सांस ली और उस आखरी सांस ने न जाने कितनों की बाकी की ज़िन्दगी से हंसी और ख़ुशी छीन ली ! आज भी अंदर से कांप उठता हूँ वह सब मंज़र सोच कर जिसकी कल्पना मात्र कोई नहीं कर सकता ! मामा के साथ मेरे कुछ पल ऐसे रहे हैं जो आज भी याद आते हैं तो रोना नहीं आता मुस्कराहट आती है, वह पल शायद मामा ने किसी और के साथ नहीं बांटे होंगे ! मामा की अंतिम यात्रा किसी त्यौहार से कम नहीं थी जिसको पुरे उज्जैन ने हर्षो उल्लास से मनाया हो ! पूरा उज्जैन, क्या आमिर , क्या गरीब , क्या बड़ा , क्या छोटा सब उस अंतिम यात्रा में मामा के साथ थे ! उस दिन ये सब देख के मामा की एक बात याद आ गयी जो एक यात्रा में मामा ने कहीं थी मुझसे “ गुल्लू पैसा तो आता जाता रहता है उससे हम चीज़ें खरीद सकते हैं, असली कमाई आपकी अंतिम यात्रा में कितनी भीड़ है उससे मालूम पड़ेगी , और देखना अपन कितनी अमीरी में जायेंगे “ ! उस दिन मैं मामा की अमीरी देख के धन्य हो गया !

 

इस जीवन रूपी चक्र में सब को आना है और जाना है ! कौन कब , कैसे जायेगा वह सिर्फ उपर वाला तय करता है ! आज 7 साल हो गए नानी के घर में आज भी ठहाके लगते हैं, मामा आज भी उस घर में है क्यूंकि पवित्र लोग घर से खुशियाँ नहीं लेके जाते वह उन खुशियों के साथ उस घर में हमेशा वास करते हैं ! इतने साल बीत जाने के बाद भी रोज़ किसी न किसी बात पे “मुन्ना” याद आ ही जाता है और एक मुस्कान चेहरे पे छोड़ जाता है !

 

मैं उम्र और कद में बहुत छोटा हूँ इतने बड़े हास्य कवि के बारे में लिखने के लिए, पर मामा मेरे दिल और जिंदगी के बहुत करीब रहे हैं और आज भी है ! दिल में एक ही मलाल रहेगा की जो हुआ जल्दी हुआ ! एक मसखरा सबको रुला के पंचतत्व में विलीन हो गया, जहाँ रहें वहां से ठहाके बरसाते रहें इसी दुआ के साथ यहाँ विराम देता हूँ ! क्यूंकि कवि महोदय उर्फ़ मुन्ना मामा के लिए लिखने बैठो तो शब्द और जगह दोनों ही कम पढ़ जायेंगे !

 

– भुवन मेहता  उर्फ़ “ रामू” | bhuvanudaipur@gmail.com 

उदयपुर के भुवन मेहता स्वर्गीय श्री ओम व्यास के एक मात्र भांजे हैं और दिल्ली में कार्यरत हैं | 

 

 

 

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