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ठुमकी और ढील देकर “काट्टा है” कहने का दिन – मकर संक्रांति

समीर शर्मा | सक्रांति | इंदौर 
बधाई इंदौर 
मकर संक्रांति | पोंगल | लोहड़ी | बीहू 
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आज सक्रांत है … आज  मानो आसमान के कैनवास पर रंग ही रंग ही बिखर गए हो.
 
कोई कन्नी बांध रहा है, तो कोई चरखी / मांझा / उचका लपेट रहा है. कहीं पतंगों को लूटने के लिए गलियों में दौड़ लगाते बच्चे… कहीं छतों पर  धूप में खड़े होकर पतंग उड़ाते बड़े व बूढ़े… यानी छत, छज्जों, मैदानों, हर तरफ पतंगबाज़ों का क़ब्ज़ा….सक्रांति पर यह दृश्य आम होता है मालवा के छोटे छोटे कस्बों , गांवो , गुजरात और राजस्थान में …
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फर्र-फर्र उड़ती पतंगे… कहीं खींच तो कहीं ढ़ील… कहीं पीछे लहराती एक लम्बी पूंछ… तो कहीं अपने पीछे ढ़ेर सारी पतंगों की कतार लिए उड़ती कागज़ की परी… कहीं तिरंगा तो कहीं चांद-तारा… कहीं तुक्कल तो कहीं लग्गू… कहीं आदमी तो कहीं चिड़िया… कहीं तो कहीं कछुआ व तितली और न जाने कितने तरह के कागज़ी हवाई-जहाज़ आसमान में अपना जलवा बिखेरते नज़र आते हैं.
माथाकट बड़ा डग्गा कहीं सब तुकालों को दारात हुआ उड़ रहा है तो कही से एक कलर का काला डग्गा बार बार डोरे डाल रहा है | छोटी और जवान पतंगे बचती फिरती, गोता लगाती वैसे ही बच कर निकल रही हैं जैसे कोई युवती आज अकेले सहम कर घर पहुँचती है …
कोई गेंहू की लाइ से पतंग चिपका रहा है तो कोई कीरनी बाँध कर उसे बैलेंस कर रहा है ..
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उड़ान के लिए उड़नची  देने का दस्तूर लाजवाब है ये सिर्फ वो ही जानते हैं जिन्होंने सैकड़ों उड़नची सिर्फ इसलिए दी हैं क्यूंकि या तो वो छोटे थे या लड़कियां ,,,,बड़े तो उड़ाने में उस्ताद होते हैं और वो ही पतंग आसमान में ले जाते थे….
पेंच लड़ा के “काट्टा है ” जिसने नहीं चिल्लाया उसका तो जीवन ही व्यर्थ है 
 
पतंग को अगवा भी किया जाता है जिसे लादी लाना बोलते हैं , जब कोई पतंग कट कर झूमती हुई नीचे आती है तो मनचला पतंगबाज़ अपने पतंग से उसले उलझा कर अपनी पतंग के साथ ले आता है ….
बिजली के तारों , पेड़ों  और खम्बो पे लटकी पतंगों लो लंगर के उतारना बड़ी कलाकारी का काम है और कुच्छ ही उसमे सिद्धहस्त होते थे या हैं… 
कपडे की चिंदियों से लम्बी पूछ बनाना आमतौर पर बहने किया करती थी …
लिप्पू पतंग एक जगह खड़ी हो जाए तो पतंगबाज़ उसे बांधकर चले जाते हैं वो अपनी जगह से हिलती तक नहीं , बिलकुल हुकुम की गुलाम की तरह… 
 
खाना पीना और ज़िन्दगी सब छत , पत्रों , पेड़ों और टीलों पर आज के दिन 
पतंगबाज़ी का इतिहास
पतंग उड़ाने की रिवाज आज से लगभग 3000 साल पहले चीन में शुरु हुआ, लेकिन पतंगबाज़ी के खलीफ़ा व उस्तादों का मानना है कि सबसे पहला पतंग ‘हकीम जालीनूस’ ने बनाई थी. कुछ ‘हकीम लुकमान’ का भी नाम लेते हैं. वो बताते हैं कि यूनान के शहज़ादे को लकवा मार गया. बादशाह के ऐलान के बाद सैकड़ों हकीमों ने अपने-अपने नुस्खे आजमाए, लेकिन कोई कामयाब न हुआ. बादशाह बहुत मायूस हो गए, और शहज़ादे के ठीक होने की उम्मीद छोड़ दी. लोगों ने शहंशाह को हकीम जालीनूस को बुलाने की सलाह दी. अंतिम उम्मीद के रुप में शहंशाह ने जालीनूस को पैग़ाम भेजा. जालीनूस ने आकर पतंग के शक़्ल की कोई चीज़ बनाई और शहज़ादे को समुद्र किनारे जाकर आसमान में उड़ाने को कहा. कई महीनों तक ऐसा करने से उसके शरीर में हरकत शुरु हुई और वो पहले की तरह स्वस्थ हो गया. शहंशाह बहुत खुश हुआ और जालीनूस को ढ़ेर सारे इनामों से नवाज़ा.
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एक सच्चा पतंगबाज़ , एक टक देखता हुआ ….पतंग को
 
बहरहाल, कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ ‘पतंग’ भारत पहुंची. यहां इसका अपना एक अलग इतिहास है. मुग़ल-दरबार में इसका ऐसा बोलबाला और खुमार था कि राजा-रजवाड़े, जागीरदार एवं वज़ीर भी पतंगबाज़ी में खुद हिस्सा लेते थे. मुगल सम्राट बहादुरशाह ज़फ़र भी पतंगबाज़ी के आशिक थे.
 
मुग़लिया दौर के बाद लखनऊ, रामपुर, हैदराबाद आदि शहरों के नवाबों में भी इसका खुमार चढ़ा. उन्होंने इसे एक बाज़ी की शक़्ल दे दी. उन्होंने अपनी पतंगबाज़ी को ग़रीबी दूर करने का माध्यम बनाया. वो पतंगों में अशरफ़ियां बांध कर उड़ाया करते थे और आखिर में पतंग की डोर तोड़ देते थे, ताकि गांव के लोग पतंग लूट सके.
 
वाजिद अली शाह तो पतंगबाज़ी के इतने दिवाने थे कि वो हर साल अपनी पतंगबाज़ टोली के साथ पतंगबाज़ी के मुक़ाबले में दिल्ली आते थे. धीरे-धीरे नवाबों का यह शौक़ आम लोगों के ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनता गया. नवाबों का दौर खत्म हुआ और देश में अंग्रेज़ों की हुकुमत क़ायम हुई, और फिर शाम होते ही नीले आसमान को चुमती रंग-बिरंगी पतंगें बलखाती व इठलाती हुई लखनऊ से दिल्ली तक नज़र आने लगी.
 
1927 में GO BACK लिखे पतंगों को आसमान में उड़ा कर साइमन कमीशन का विरोध किया गया. देश जब अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद हुआ, तब भी देशवासियों ने अपनी खुशी का इज़हार करने के लिए पतंग को भी एक माध्यम बनाया और आसमान को रंग-बिरंगी पतंगों से पाट दिया. तब से जश्न-ए-आज़ादी के साथ पतंग भी जुड़ गई.

पतंग बाजी शब्दावली

Kite flying vocabulary in India

  • पतंग (patang): kite
  • डोर (Dor  ) :thread which is used to fly kites
  • तंग (tang): the V shaped thread with knots to hold the kite perpendicular to wind. the quality of it defines the aerodynamics of kite.
  • कांप (kaamp): the bamboo sticks used for kite’s structure apart from sheet of paper.
  • कन्नी / जोते (kanni): if the kite is aerodynamically skewed in one direction its call kanni kat. (bad form of kite)
  • लिप्पु (lippu): type of kite which only flies in strong wind due to its lose design.
  • मांझा (manzha): the thread furbished with glass or iron for kite fighting competition. this cuts finger if not handled carefully.
  • गिरगडी / चरखी (charkhi): where above thread is rolled and kept. (spool)
  • गाँठ / गीठान (gaanth): knot
  • ढील (dheel): to release the thread from spool to further the kite.
  • साद्दा (sadda): non glass coated thread for children.
  • पेच (pech): kite fighting competitions.
  • उपल्ले लगना (upalle): if the kite goes out of stratosphere to other atmosphere layers. due to upward wind.
  • आँख कट (aankh kat): a kite with two dot which look like eyes.
  • दरवाजा कट (darwaja kat): a kite with 2 strips on top left and right corner of it.
  • पिन्नी कट (pinni kat): a kite made of plastic sheet.
  • माथा कट (matha kat): a kite made in two papers from the diagonals.
  • चाँद तारा (chand tara): a kite moon and stars are drawn on it.
  • काला गोला / नीला गोला (kala gola): a kite with just the color and no pattern.
  • अल्लगे : (alag he) something like (how is that? => howwzzat!) when you win kite fighting competition and cut the kite of the other guy.
  • छुट्टी देना : to release the kite by hands, from 20-30 feet distance so that it can grab air flow easily and fly.
ये सब बचपन में था …अब नहीं
 
इंदौर बदल गया है , कुछ पुराने ईलाकों में आज भी ये नज़ारे एक छोटे रूप में मौजूद हैं ….
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Indore Ka Raja - Ganeshotsav

About Sameer Sharma

Founder and Editor, www.ohindore.com