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सन्डे और ५६दुकान के पोहे… हमारी जीवन रेखा “पोहे” पर एक प्रस्तुति

समीर शर्मा | इंदौर 

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सन्डे और ५६ दुकान पे पोहे..

 

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शायद ही कोई ऐसी पीढी है, सन 80 के बाद की, कि  जब ५६ दुकान शुरू हुई , और जिसने वहां जाकर पोहे ना खाएं हों |

सुबह-सुबह स्टूडेंट्स, मॉर्निंग वॉकर्स, या कारों और बाईक्स पर आते परिवार ..हर कोई ५६ दूकान पर अगर सुबह आता है तो, उसका अर्जुन-उद्देश्य सिर्फ पोहा-जलेबी-चाय ही होता है, यह एक इन्दोरी सच्चाई है, कोई प्रतिवाद आ ही नहीं सकता इसमें |

५६ दुकान, सच बोलो तो आज़ादी का एहसास, और चूंकि इस शहर में बड़े जलाशय, झील या किले जैसे ऐतिहासिक ईमारतों का अभाव है, इसलिए बाहर अकेले या परिवार के साथ घूमने जाने/ आउटिंग के अहसास को पूरा करता है|  

 

खैर, ५६ पर ही क्यूँ और कहाँ खाते हैं पोहे :

 

वैसे  तो अब ५६ दुकान  पर सुबह-सुबह ५-६ जगह पोहे मिलते हैं पर, लखन भिया/ गुप्ताजी / कुछ इन्हें शर्मा जी भी कहते हैं (ये सब में ही, “जी हाँ”करके पोहे खिला देते हैं ) के पोहे यहाँ सबसे ज्यादा फेमस , स्वादिष्ट और पुरातन हैं |

सन 80 से अपनी पोहे की दुकान लगा रहे, गुप्ता जी का व्यवहार और उनके बेहद स्वादिष्ट इन्दोरी पोहे ही उनकी पहचान हैं |

छोटी सी टेबल पर लगा पुराना स्टोव्ह, उसके पास गर्म पानी की टंकी और  उसके ऊपर भाप से गर्म हो रहे पोहे की बड़ी परातनुमा कढाई  ….पीछे खड़े मुस्कुराते , लखन भिया/ गुप्ता जी

आप पहचान गए होंगे अवश्य ही …

 

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५६ के इन्दोरी पोहे पहले से ही पानी में भीगे हुए और कच्चे मसालों के साथ मिक्स होकर तैयार रहते हैं और इन्हें भाप पर थोड़ा-थोड़ा पकाकर गर्मागर्म परोसा जाता है | इसमें हरी मिर्च, हल्दी, धनिया और राई-ज़ीरा के साथ हींग भी डाली जाती है |

इसकी प्लेटिंग बड़ी ही मजेदार है , गुप्ता जी चमकीली चांदी जैसी कागज़ पट्टी में पोहे, मोटी सेंव, चरखी बूंदी, बारीक सेंव का मिक्सचर डालते हैं और उसमे नीम्बू निचोड़कर और ताज़ा कटे कच्चे प्याज डालते है , और फिर “चेरी ऑन द टॉप” इंदौर की पहचान जीरवन का छिडकाव ……ओह्ह्ह्हो हो हो हो ..बस्स्स्स अब और क्या चाहिए इस पार्थिव संसार में …दोस्त हों , सन्डे हों , ५६ पर आप और आपके परिवार/ मित्र या कोई “विशेष साथी” और गुप्ता जी के पोहे …..”मोक्षं प्राप्य” की भावना आपके ललाट पर दिखती है|

 

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दौड़कर, जिम से  , मॉर्निंग वाक से आने वाले पोहे ना खाएं ऐसा हो नहीं सकता, एक इन्दोरी ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि भिया यदि मैं ये पोहे ना खाऊन तो मुझे सन्डे , सन्डे नहीं लगता और तो और “मेरा छोरा” भी अपने दोस्त के साथ यहीं आता है, ये तो अब हामारे डी एन ए में घुस गया है …कंट्रोल ही नहीं होता है , ऐसा स्वाद है ५६ के पोहों का ..

कई परिवार “हाईजीन” की दृष्टि से मुझे केसरोल और डब्बों में पैक करवा कर घार पर ले जाते दिखे, कई अपना चम्मच साथ में लाये थे |

 

ये इंदौर है भिया, यहाँ  कुछ भी हो सकता है…

 

पर बात मुद्दे की ये है कि ५६ दुकान पर शर्माजी, जे एम् बी , और भी २-३ दुकाने हैं पर मज़ा जो गुप्ता जी के पोहों का है वो कहीं नही ….

 

यदि आप  नहीं गए तो परिवार के साथ ज़रूर जाईये , अच्छा लगेगा , सभी को …

तो चलें ५६ …..

आपके फीडबैक / कमेट्स हमेशा प्रेरित करते हैं , जरूर भेजिए | कमेंट्स सेक्शन में लिखें या मुझे ईमेल करें ohindore@gmail.com पर 

– समीर शर्मा | www.ohindore.com

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समीर शर्मा | इंदौर  . सन्डे और ५६ दुकान पे पोहे..   . शायद ही कोई ऐसी पीढी है, सन 80 के बाद की, कि  जब ५६ दुकान शुरू हुई , और जिसने वहां जाकर पोहे ना खाएं हों | सुबह-सुबह स्टूडेंट्स, मॉर्निंग वॉकर्स, या कारों और बाईक्स पर आते परिवार ..हर कोई ५६ दूकान पर अगर सुबह आता है तो, उसका अर्जुन-उद्देश्य सिर्फ पोहा-जलेबी-चाय ही होता है, यह एक इन्दोरी सच्चाई है, कोई प्रतिवाद आ ही नहीं सकता इसमें | ५६ दुकान, सच बोलो तो आज़ादी का एहसास, और चूंकि इस शहर में बड़े जलाशय, झील या किले जैसे ऐतिहासिक…

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Founder and Editor, www.ohindore.com

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