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याद हैं ना ये टिफिन बॉक्स – बचपन का सबसे कीमती सामान और ना भूलने वाली याद

हमारे टिफिन की कहानी और यादें 

हिंदी ब्लॉग साईट लिटिल रेड बॉक्स एक बार फिर से

आपकोअपनी मीठी यादों में ले जाने को तैयार है ,

तो चलें  इस बार अपने स्कूल के टिफ़िन के मेनू की यादों में …

एक खन या दो खन का जर्मन / अलुमिनियम डब्बा , स्टील, प्लास्टिक डब्बा ,

अचार परांठा , सैंडविच, दाल चावल, हलवा और पूरी सब्जी की यादों से भरा …

प्यारे स्कूल के टिफ़िन बॉक्स,
 
स्कूल में लंच ब्रेक की घंटी बजने से पहले ही तुम्हारे बंद खानो में छिपे खाने का राज़ सोचते सोचते मन तरह-तरह के खयाली पुलाव पकाने लगता था।
 
टीचर क्लास से कब निकले, घंटी कब बजे, और बस्ते से तुम कब बहार आओ इसी सोच में आधी पढ़ाई भुला दी जाती थी।  टन – टन – टन की आवाज़ और खटाक से खुलता था डब्बा।  कभी आलू के पराठे , कभी पनीर, कभी सैंडविच, कभी पुलाव, और कभी माँ के धमकी भरे शब्दों से सने ‘पौष्टिक’ लौकी, कददु के साथ रोटी (“पूरा ख़तम करना, वरना….”)
 
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डब्बे में चाहे जो भी हो, मन इसी ख़याल से डबल छलांगे लगाता था कि अभी दोस्त के डिब्बे का नज़ारा देखना बाकी है।  अपने पराठों का दोसा से एक्सचेंज, या एक मिठाई का दसवा टुकड़ा पाकर भी यूँ  लगता मानो हर दिन किसी 5 सितारा रेस्टोरेंट में दावत का मज़ा लिया जा रहा हो।
 
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और एक ख़ास एडवेंचर तो शायद तुम्हारे साथ सभी ने किया होगा।  टीचर से छिपते- छिपाते, हलके से ढक्कन खोलकर, झट से लड् डु  निकालना और गप से मुँह में ! पास बैठे सहपाठी को भी कभी-कभी मैथ्स के उलझनों से बचाकर माँ के हाथ के बने चने मसाले का स्वाद चखाया जाता था।  वो दोस्त चाहे जहा भी हो, चने मसाले का स्वाद याद करना आज भी नहीं भूलता।
 
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किसी दिन कोई गलती से डब्बा लाना भूल जाये – कोई बात नहीं….मिनटों में हर किसी के डब्बे से परोसी multicuisine थाली पेश है।
 
 
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सच, आज समझ में आता है, तुम्हारे बंद खानो में रोटी-सब्जी के साथ साथ कितना कुछ सिमटकर आता था – माँ का प्यार, पुराने दोस्तों की दोस्ती और नए दोस्त बनाने के १०१ तरीके…कभी-कभी टीचर के चेहरे पर मुस्कान लाता एक निवाला जो थोड़ा झिझकते, थोड़ा शरमाते उन्हें पेश किया जाता था।  
आज स्वाद तो बहुत से पकवानों का चखा है, पर रिश्तो को ज़िन्दगी भर बाँधता प्यार का मीठा स्वाद सिर्फ तुमसे ही पाया है….
– टीम लिटिल रेड बॉक्स 
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यह पोस्ट लिटिलरेडबॉक्स.इनसे साभार लिया गया है, ओहइंदौर.कॉम और लिटिलरेडबॉक्स.इन  के साझा करार के तहत अनुमति लेकर इसे प्रकाशित किया गया है | बेहतरीन हिंदी कटेंट को इंदौर के सभी लोगों तक पहुंचाने और अच्छे साहित्य को बढ़ाना ही इसका मूल उद्देश्य  है |

यह एक हिंदी ब्लॉग है जिसे श्री आरिश नांदेडकर और सुश्री अतुला गुप्ता दो मित्र और पार्टनर्स संचालित करते हैं | यह एक उम्दा हिंदी रचनाओं का ब्लॉग है, जो आपको आपके स्वर्णिम बचपन और पुरानी यादों में लेकर जाता है

About Sameer Sharma

Founder and Editor, www.ohindore.com