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गर्मी की छुट्टियाँ ० लिटिलरेड बॉक्स से एक और पेशकश , यादों का पत्र

यादों का पत्र…

 

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प्यारी गर्मी की छुट्टियों,

तुम कहाँ चली गईं…और अपने साथ कितना कुछ ले गईं.

वो नानी के घर जाना, दिन भर उधम मचाना, तपती धूप में शैतानियाँ, वो कॉमिक्स पढ़ना और उनकी लाइब्रेरी चलाना, फ्रीज में दूध-पानी की आइसक्रीम जमाना, वो ताश की बाज़ियाँ और सांप-सीढ़ी के दाँव, रसना पार्टियाँ, रात को वीसीआर पर फिल्म देखने का चाव, छत पर बर्फ सी ठंडी चादर पर पसर जाना, तारों की छत के नीचे, नानू से कहानी सुनते-सुनते सो जाना…

पहले तो छुट्टी पड़ते ही बस्ते से कुट्टी हो जाती थी, अब तो हॉलिडे होमवर्क, मास्टर जी के डंडे सा डराता है.  

तुम खो गई हो, पर फ़िर तुम कहोगी कि बच्चों का बचपन भी तो खो गया है. बेफ़िक्री, मासूमियत, मस्ती छोड़कर क्लासेस और कॉम्पिटिशन्स का हो गया है, उम्र से पहले ही बड़ा हो गया है.

उसे लौटा लाओ तो मैं भी लौट आऊँगी… तुम्हारी तरह उनका बचपन भी, नानी के अचार-मुरब्बों जैसा खट्टा-मीठा बनाऊँगी.

 

सौजन्य से : लिटिलरेडबॉक्स.इन

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यह पोस्ट लिटिलरेडबॉक्स.इनसे साभार लिया गया है, ओहइंदौर.कॉम और लिटिलरेडबॉक्स.इन  के साझा करार के तहत अनुमति लेकर इसे प्रकाशित किया गया है | बेहतरीन हिंदी कटेंट को इंदौर के सभी लोगों तक पहुंचाने और अच्छे साहित्य को बढ़ाना ही इसका मूल उद्देश्य  है |

यह एक हिंदी ब्लॉग है जिसे श्री आरिश नांदेडकर और सुश्री अतुला गुप्ता दो मित्र और पार्टनर्स संचालित करते हैं | यह एक उम्दा हिंदी रचनाओं का ब्लॉग है, जो आपको आपके स्वर्णिम बचपन और पुरानी यादों में लेकर जाता है

 

वामन हरी पेठे, इंदौर

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