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एक पत्र …अपने बेटे को …श्री प्रवीण गार्गव का आलेख

ओह इंदौर . कॉम , हमेशा अपने पाठकों को उच्च कोटि की सामग्री पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है..इसी श्रुंखला में हम अपने साहित्य वर्ग (कैटेगरी ) को प्रारंभ  करते हुए स्थानीय तथा अन्य लेखकों , कवियों, शायर और बुद्धिजीवियों के आलेख प्रस्तुत करेंगे | आशा है हिन्दी और अंग्रेज़ी के आलावा मराठी , मालवी और गुजराती लेख भी हमें पढ़ने को मिलेंगे | हमारे इस किंचित प्रयास को आपके समय की आवश्यकता रहेगी, अपनी प्रतिक्रिया अवश्य  दें ….ohindore@gmail.com पर …

आज का प्रथम आलेख,  पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजिनीयरिंग किये हुए पर ह्रदय से लेखक श्री प्रवीण गार्गव जी का है …सरल और गुणी , सहज स्वभाव के व्यक्तित्व वाले प्रवीण गार्गव मूलत: उज्जैन के हैं और वर्तमान में इंदौर में म.प्र . इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में सीनियर इंजीनयर हैं | आपकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं | 

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सहेजना शब्दों की विरासत

सहेजना शब्दों की विरासत

प्रिय बेटे प्रांजल

….ये सारी बातें मैं तुम्हे फोन पर भी कह सकता था। परंतु लिख रहा हूँ ताकि तुम पाठ्यक्रम की पुस्तकों और मोबाइल सन्देशों के आलावा भी कुछ पढ़ों। आधुनिक जीवन शैली और गला काट प्रतियोगिता ने सबसे बड़ा नुकसान तुम्हारी पीढ़ी को साहित्य से दूर कर के किया है, विशेषकर हिंदी साहित्य से।

हमने भी भेड़-चाल कहें या समय की मांग को देखते हुए तुम्हे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाया। फिर भी हिंदी हमारी मातृभाषा है। हमें इससे प्रेम करना है और सही सीख कर इसका सम्मान भी करना है। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मोबाइल के एसएमएस और अन्य एप पर जो स्लैंग का उपयोग किया जाता है, उससे रहा-सहा भाषा का ज्ञान भी लोप हो रहा है। मैं जानता हूँ तुम्हे अपनी कॉलेज की पढ़ाई से समय नहीं मिलता फिर भी किसी तरह अपनी दिनचर्या में सुधार कर उसमें से कुछ समय अवश्य निकालो। कुछ अलग सा पढ़ने के लिए। यह समय तुम मोबाईल, फेसबुक, वाट्स एप इत्यादि में जो समय व्यतीत होता है उसमें से भी चुरा सकते हो। मैं तुम्हे हिंदी की अच्छी विचारोत्तेजक पुस्तकों को पढ़ने की सलाह दे रहा हूँ। हिंदी हमारी मातृभाषा है। इसमें लिखा हम आसानी से आत्मसात कर लेते हैं। दरअसल हम सोचते तो अपनी मौलिक भाषा में ही हैं।

हिंदी साहित्य हमें अपने संस्कारो, अपनी विरासत, अपने मूल्यों से जोड़ता है। हमें अपनों से जोड़ता है। पुस्तकों का संसार अदभुत है। अच्छी पुस्तकें जीवन जीना सिखाती हैं। इनमें जीवन क़ि बहुत सी समस्याओं का हल छिपा होता है। तुम जब पढ़ना आरम्भ करोगे तो अनुभव करोगे ये अध्ययन एकरसता को भी तोड़ता है और हमें उमंग और उत्साह से भर देता है। जीवन में सब कुछ अपने ही अनुभव से सीखना कठिन है। फिर नुकसान भी हो सकता है। दूसरों के जीवन का सत हमें इन पुस्तकों से मिल सकता है। पढ़ा हुआ साहित्य विपरीत परिस्थितियों मे और कठिन चुनौतियों के समय में संदर्भ बन कर हमारी मदद करता है। पुस्तकें सफर में, इन्तजार में और अकेलेपन में हमारी सबसे अच्छी मित्र है, सलाहकार है। ये उदासीनता से बचने का भी साधन है। मेरे एक मित्र की तो नींद न आने की समस्या भी पढ़ने से हल हो गई। भले ही कुछ ही पेज पढ़ो पर प्रतिदिन पढ़ो जरूर। तुम देखोगे वर्ष भर में तुमने चार पांच पुस्तकें पढ़ ली हैं। एक अच्छी पुस्तक पढ़ने के बाद हमारा व्यक्तित्व वो नहीं रहता जो पहले था।

अच्छी पुस्तकें हमारी सोच को ऊँचाई और विस्तार प्रदान करती है। किसी से बात करते समय आपका साहित्य से जुड़ा होना आपके व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता है, आपको औरों से अलग करता है। पुस्तकें तुम्हारे शब्दकोष को भी समृद्ध करेंगी। तुम देखोगे की सही शब्द चुनने से समस्या भी कई बार आसान हो जाती है। सम्प्रेषण आसान स्पष्ट हो जाता है और विचार व्यवस्थित हो जाते हैं। लाभ अनगिनत हैं और नुकसान कुछ भी नहीं। केवल इच्छा जाग्रत करना है और समय प्रबन्धन करना है ।

       यह तो अनेक सुविधओं का युग है। अधिक पुस्तकें साथ नहीं रख सकते तो ई-बुक रीडर को जानो और उपयोग करो। लेकिन पढ़ो अवश्य। तुम देखोगे तुम्हारा समय जो पढ़ने में गया उसने तुम्हारी क्षमता को बढ़ाया और पाठ्यक्रम की पुस्तकों को समझने में फिर तुम्हे कम समय लगा। खूब लिखा जा रहा है, अच्छा भी लिखा जा रहा है, बस पाठक कम हो रहे हैं। इसलिए हमेशा मैं तुमसे कहता रहा हूँ आज लिख कर कहता हूँ-‘अपने को पुस्तकों से जोड़ो। पुस्तक मित्र बनो।‘

तुम्हारा पिता

प्रवीण गार्गव (GARGAV)

६५ रविन्द्र नगर इंदौर (म.प्र.)

pkgargava@hotmail.com

वामन हरी पेठे, इंदौर

About Sameer Sharma

Founder and Editor, www.ohindore.com

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