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हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम – पतंगबाजी का मौसम

हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम

आ गया फिर से पतंगबाजी का मौसम. जमीन पर रहकर आसमान से बातचीत करने का मौसम. झूमती, इठलाती, जिद्दी पतंगों को वश में करने का मौसम. यह नीचे नहीं ऊपर देखने के दिन हैं. पतंग उड़ाना अपनी इच्छाओं को पंख लगाकर उड़ाने जैसा है. जब हमारी पतंग हवा में उड़ती है, तब लगता है, हम भी सारी परेशानियों और तनाव को भूलाकर आसमान की सैर कर रहे हैं. पतंग उड़ाने का दूसरा मजा यह है कि अक्सर इसकी मनाही रहती है.

हर पतंगबाज के लिए वे यादगार क्षण होते हैं, जब पहली बार उसकी पतंग हवा में ऊंची उठती है. अपने माता, पिता, भाई, बहन, दोस्त सभी को आवाज देकर यह कारनामा बताता है. बताने योग्य बात भी है. अगर आपने कभी पतंग नहीं उड़ाई है और आप यह मानते हैं कि यह एक आसान कार्य है, तो एक बार प्रयास अवश्य करें. पतंग हवा के साथ बहने वाले तिनकों के सामान नहीं है. वह तो हवा के विपरीत रुख करती है और ऊपर उठती है. जीवन में प्रगति करने का भी यही फार्मूला है. परिस्थितियों को पीठ दिखाकर नहीं बल्कि उनका सामना करके ही उन्हें जीता जा सकता है. एक पतंग की गति तभी तक है, जब तक की उसकी डोर कुशल हाथों में है. अकुशल हाथों में आते ही दिशाहीन हो जाती है. डोर से बंधी रहकर ही पतंग आसमान में मस्त इधर-उधर डोलती है और सुरक्षित वापस उतर जाती है. उसकी शान तभी तक है जब तक कि वह डोर से बंधी है. डोर टूटते ही पतंग तिनके के सामान हो जाती है.  उन युवाओं की गति भी कटी पतंग के समान होती है, जिनके संस्कारों की डोर टूट जाती है. जिन्हें बंधन पसंद नहीं है, उन्हें कटी पतंग अवश्य देखना चाहिए. विख्यात नर्मदा यात्री श्री अमृतलाल वेगड़ “सौंदर्य की नदी नर्मदा” में लिखते है “हमारे जीवन में सूरज का अनुशासन भी हो और चाँद का स्वैर विहार भी हो. नियम का कठोर पालन भी हो और मौज-मस्ती की गुंजाईश भी हो.”

बिजली के तारों ने और ऊँची इमारतों ने इस शौक को कठिन बना दिया है. जिन्हें छत नसीब नहीं है, उन्हें छत से उड़ाने वाले बच्चों से पेंच लड़ाने के लिए अधिक डोर की आवश्यकता होती है. यही तो व्यावहारिक जीवन में होता है. कौन, किस प्लेटफार्म से कैरियर की शुरुआत करता है, यह महत्वपूर्ण हो जाता है. असुविधाओं और अभावों के बीच पढ़ने वाले बच्चों का मुकाबला पब्लिक स्कूल के बच्चों के साथ होता है, जो सर्वश्रेष्ठ कोचिंग प्राप्त करते हैं. पतंग की दुनिया में कई गठानों वाली डोर और चिपकी हुई पतंग होने के बावजूद जमीन से उड़ाने वाले लड़के छत से उड़ाने वाले लड़कों की पतंग काट देते हैं. फंडा यह है कि जिसकी पतंग अधिक डोर पर है वह अधिक सधी होती है. पेंच के समय यही नियंत्रण दूसरी पतंग को काटने में सहायक होता है. हमारे आसपास भी ऐसे मजबूत व्यक्तित्वों को हम आसानी से पहचान सकते हैं, जिन्हें जीवन की पतंग उड़ाने के लिए ऊँची छत नहीं मिली. जिनकी पतंग को छुट्टी देने वाला कोई नहीं था. जिनके पास घिर्री पकड़ने वाला सहायक नहीं था. परन्तु इन असुविधाओं ने उन्हें स्वालंबी बना दिया.

   होमवर्क के बोझ ने और मनोरंजन के अन्य साधनों ने पतंगबाजी के शौक को कुछ हद तक हाशिए पर कर दिया है. आज के बच्चे पतंगबाजी की कई विधाओं में महारत हासिल नहीं कर पाते हैं. पतंग के जोते बाँधने के लिए मोहल्ले के पुराने पतंगबाज को ढूंढते हैं. डोर सूती हुई ही लाते हैं. स्वयं सूतने का मजा कुछ और ही था. डोर खींच की होगी या ढील की इस आधार पर लुग्धी बनाई जाती थी. आज बच्चों का पतंगबाजी से जुड़े शब्दों का ज्ञान भी सीमित हो गया है. पतंग में खिरनी बाँधना, कुटकी लग जाना, ठुनकी लगाना, उचका चूम हो जाना इत्यादि शब्दों से वे अनभिज्ञ हैं. इन शब्दों और पतंग के साथ बचपन की कई यादें भी जुड़ी हैं. कई बार ऊपर देखकर चलने के कारण गिर जाते थे. काटने पर तो चिल्लाते ही थे पर कट जाने पर भी खीज उतारने के लिए जोर से “कटवाई है” का नारा लगाते थे. अगले दिन स्कूल में पेंच काटने और कटवाने का जब मित्रों को हिसाब दिया जाता तो सभी के खाते में काटी हुई पतंग अधिक होती थी. दिन भर छत पर या मोहल्ले में कटी पतंगों के पीछे भागना. माँ का नाराज होना. पिता से छुपाकर पतंग के पैसे देना ताकि छत पर रोड पर पतंग लूटने के लिए नहीं दौड़े. परन्तु यह सच है न मालूम क्यों जो मजा लूटी हुई पतंग उड़ाने में आता था वह खरीदी हुई पतंग उड़ाने में कभी नहीं आया.

 

 संक्रांति विशेष लेख : प्रवीण गार्गव 

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