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छोटी-छोटी बातें – Friendship Day Special article by Praveen Gargav

छोटी-छोटी बातें 

 

दोस्तों में तो अधिकतर छोटी-छोटी बातें ही घटती हैं परन्तु  तब  अहसास ही नहीं होता कि पूरी उम्र उनकी यादें साथ-साथ चलेंगीं। छोटी मामूली बातों से कभी-कभी जीवन बदल जाता है, सोच बदल जाती है, प्रेरणा मिल जाती है। अगर कुछ परिवर्तन घटित होना है, जिसकी तैयारी वर्षों से अंतर्मन में चल रही है तो फिर एक छोटी सी घटना ही बहुत हो जाती है छलांग लगाने के लिए।

किसी मित्र के द्वारा सामान्य परिस्थिति में किया गया व्यवहार या बोले गए शब्द ताउम्र याद रह जाते हैं। जीवन छोटी-छोटी बातों से ही तो  बनता है।

     क्या हम भूल सकते हैं, उस सहकर्मी मित्र को या वरिष्ठ अधिकारी को जो समय पर हमारी जिम्मेदारी लेकर हमें अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी निभाने में मदद करता है?

जब माँ गंभीर रूप से बीमार थीं और एक आवश्यक कार्य से प्रवास करना था। मेरे वरिष्ठ अधिकारी मेरी जगह प्रवास पर गए। उनके इस निर्णय के कारण मैं अंतिम समय में माँ के पास रहा जो मेरा इन्तजार कर रही थी। प्रशासन और मानवीयता को एक साथ निभाने का यह एक श्रेष्ठ छोटा सा उदाहरण हैं।

       फेसबुक पर एक अच्छा विडियो देखा। एक गर्भवती महिला अपनी बिल्डिंग के भूतल पर लिफ्ट के सामने बैचेनी से खड़ी है। ऊपर किसी मंजिल पर लिफ्ट का गेट ठीक से बंद नहीं किया था। एक बच्चा खेलते हुए आता है और जब यह देखता है तो दौड़ता हुआ ऊपर जाता है और लिफ्ट का गेट ठीक से बंद कर लिफ्ट को नीचे लाता है। यह है प्रेम से किया गया  छोटे  मित्र  द्वारा  बड़ा कार्य।

     कैसे कोई छोटी सी बात दिल को छू जाती है और भूलाए नहीं भूलती इसकी एक और मिसाल है यह छोटी सी घटना। मेरे एक मित्र हैं, रीवा में निवास करते हैं। इंजीनियरिंग कॉलेज में मेरा प्रवेश 35 वर्ष पूर्व रीवा में ही हुआ था तब वे वहाँ मेरे सीनियर थे। मैं वहां कुल जमा चालीस दिन रहा और फिर इंदौर के महाविद्यालय में स्थानान्तरण हो गया। रीवा पहली बार घर से दूर गया था। मेरा वहाँ कोई परिचित नहीं था। उन दिनों रेगिंग भी बहुत होती थी। मेरे माता-पिता, बहनें और मेरे गहरे मित्र बहुत चिंतित थे और मुझसे बिछुड़कर दुखी थे। जब रीवा गया तो रेगिंग के दौरान उनसे एक छोटी सी मुलाक़ात हुई और कुछ इस तरह मन मिले कि आज तक संबंध जीवंत हैं। कुछ वर्ष पूर्व उनकी बिटिया की शादी थी।

उज्जैन में मेरे एक और गहरे मित्र हैं, वे भी उन्हें जानते हैं और इसलिए उन्हें भी आमंत्रित किया गया था। उज्जैन वाले मित्र व्यस्त व्यक्ति हैं। जब मैंने उनसे रीवा जाने की बात कि तो उन्होंने कहा ‘मैं निश्चित जाउंगा वो तुम्हारे मित्र हैं लेकिन उनका मुझ पर भी अहसान है।‘ जब मैंने पूछा ‘क्या अहसान है?’ तो उन्होंने बहुत भावुक जवाब दिया ‘जब तुम रीवा में पढ़ने गए तब हम सब चिंतित थे और उन्होंने तुम्हारा बड़े भाई की तरह ख्याल रखा इसतरह उन्होंने हम पर अहसान किया है, उनके घर की शादी में अवश्य जाना है।’

….इन शब्दों को बाद में निभाया भी गया। इसतरह के वाकिये ही तो रिश्तों को प्रगाड़ बनाते हैं। इसीतरह तो सींचे जाते हैं रिश्ते।

      

इसके विपरीत कई बार अनजाने में ही हम अपने रिश्तों की गर्माहट हम खो देते हैं। 

मित्र बहुत दूर से आपके शहर आता है आप उसे कुछ समय भी नहीं देते और खेद भी व्यक्त नहीं करते। कई बार सचमुच व्यस्तता रहती है लेकिन तब भी यह स्पष्ट किया जा सकता है कि वो आपके लिए महत्वपूर्ण है। मेरे एक मित्र उच्च पद पर हैं, वे मुझे समय नहीं दे पाए लेकिन उनका व्यक्तिगत वाहन तत्काल उपलब्ध करवाया। दिन में कई मेसेज किए। यह साबित कर दिया कि ‘मैं आपके साथ हूँ ‘। हमारे अपने, हमारे बहानों को आसानी से समझ जाते हैं और हमारी मजबूरी को भी समझ जाते हैं। इसलिए पूरी ईमानदारी से अगर रिश्ते निभाए जाएं तो जीवन भर ये रिश्ते संबल प्रदान करते हैं, अचानक रूखे नहीं होते। इसी तरह समय पर पहुँचना और साथ निभाना भी महत्वपूर्ण है। बाद में पहुँचते हैं तब तक दुःख की या परेशानी की तीव्रता समाप्त हो जाती है या कम हो जाती है। आँसू सूख जाने के बाद रोने वाले को कंधे की आवश्यकता नहीं होती।

           बड़े-बड़े काम करने में हम अक्सर छोटी-छोटी बाते भूल जाते हैं। बड़े लोगों से मिलने या स्वागत में अक्सर उन मित्रों को भूल जाते हैं जो हमारी सफलता और इंतजाम के आधार होते हैं। शादी या फंक्शन में दूर-दराज से कोई मित्र आता है और आप पांच मिनिट भी उससे बात नहीं करते। अपनी सफलता में अपनों का जिक्र करना भूल जाते हैं। गलती की माफ़ी मांगना भूल जाते हैं। धन्यवाद देना भूल जाते हैं। अपने शहर या घर लौटकर जहाँ से बिदा हुए थे, उन्हें अपने सकुशल पहुँचने का संदेश देना भूल जाते हैं। कार्य हो जाने के बाद धन्यवाद देना तो दूर यह भी नहीं बताते हैं कि कार्य हो गया है। हम नहीं चाहते कि अधिक से अधिक लोग क्रेडिट लें और हम पर अहसान हो परन्तु हम यह भूल जाते हैं कि छोटी-छोटी बातों की यादें बड़ी होती हैं।

 

जब रिश्ते नजदीकी हो जाते हैं तो छोटी बातें बड़ी हो जाती हैं।

जय प्रकाश चौकसे जी ने अपने किसी  स्तंभ में सही लिखा था ‘मनुष्य मन की सोच सुई की तरह होती है जिससे हाथी गुजर जाता है दुम अटक जाती है’।

 

प्रवीण कुमार गार्गव (GARGAV) | मो. 9425804959

 

 

 

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