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हमेशा खरे रहेंगे अनुपम मिश्र – गांधीवादी और पर्यावरण संरक्षक श्री अनुपम मिश्र स्मृति आलेख

समीर शर्मा | इंदौर | २०-१२-२०१६

अनुपम मिश्र नहीं रहे ! 

 “अनुपम मिश्र जी पानी बचाने के लिए हमेशा आगे रहे, जिसका उदाहरण है जब भी उनके यहां जाएं तो पूछते थे कितना पानी पियोगे – आधा गिलास या उससे ज्यादा या फिर पूरा गिलास, जितना पियोगे उतना ही दूंगा. पानी बहुत कम है. इसे बर्बाद मत करना.”

आज की मोबाइल जनरेशन और मिनरल वाटर पीते हुए युवा और आमजन को शायद पता भी नहीं होगा कि कौन थे अनुपम मिश्र !!! पानी के योद्धा , गांधीवादी और जैसा दिखने वाला, वैसा लिखने वाला और ठीक वैसा ही जीने वाला..!

संक्षिप्त परिचय :

  • जाने-माने गांधीवादी, पत्रकार, पर्यावरणविद् और जल संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन लगाने वाले अनुपम मिश्र 68 बरस के थे.
  • हिंदी के दिग्गज कवि और लेखक भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे अनुपम बीते एक बरस से प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे थे.
  • विकास की तरफ़ बेतहाशा दौड़ते समाज को कुदरत की क़ीमत समझाने वाले अनुपम ने देश भर के गांवों का दौरा कर रेन वाटर हारवेस्टिंग के गुर सिखाए.
  • ‘आज भी खरे हैं तालाब’, ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ जैसी उनकी लिखी किताबें जल संरक्षण की दुनिया में मील के पत्थर की तरह हैं.
  • साल 1996 में मिश्र को इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी नवाज़ा गया.

खैर …यह खबर जब कल पता चली तो सीधे मैं कुछ वर्ष पहले की अपनी दिल्ली यात्रा की याद अपने आप चला गया जहाँ मुझे श्री महेंद्र जोशी जी लेकर गए थे और मुझे उनसे मिलवाने ही ले गए थे | कारण बताया था कि कुछ लोगो से हमेशा मिल लेना चाहिए क्यूंकि बिरले लोगों से मिलना, बात करना और उनके कामो से सीखना किसी किताब का निचोड़ ले लेने से कम नहीं होता है | इसलिए चलो ….

हुआ भी वैसा ही ..

जितना जोशी जी ने बताया वैसा ही व्यक्तित्व, पहनावा, बात करने का ढंग और फिर क्या मैं उनका “फैन” हो गया …

उन्होंने मुझे एक छात्र की तरह ही पानी के बारे में बताया और उसके मोल के बारे में …

फिर उन्होंने मुझे उनकी लिखी किताब “आज भी खरे हैं तालाब ” उपहार में दी. लगभग २ घंटे हम साथ रहे और फिर हमेशा के लिए साथ हो गया वो चाहे कभी कभी फोन या पत्र का ही क्यूँ न हो | 

एक ज़बरदस्त आदमी जो धुनी थे , लेखक , पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध , और जैसा कहते वैसा ही करते या यूँ कहिये की जैसा करते थे वैसा ही कहते थे …

उनके जैसा सम्पादक हो पाना मुश्किल है …उनकी सम्पादन शैली को लोगो ने एक आदर्श माना है …

 

प्रभाष जी ने सही कहा था- वे हमारी दुनिया के अनुपम आदमी थे।

 

सनातन धर्म से भी पुराना एक और धर्म है। वह है नदी धर्म। गंगा को बचाने की कोशिश में लगे लोगों को पहले इस धर्म को मानना पड़ेगा। – अनुपम मिश्र

 

प्रसिद्द पत्रकार रवीश ने कहा कि :

वे लिखने पढ़ने वालों से वे अक्‍सर कहते थे-  सरल रहो, सहज बनो और जैसा जीते हो वैसा लिखो। वे कहते थे- सभी लेखक पीपल या बरगद का पेड़ नहीं हो जाएंगे। जरूरी नहीं कि हर लेखक बड़ा हो जाए। कुछ लेखक पत्‍तियां भी बनेंगे और शाख भी। समाज देखता है। जरूरी नहीं कि जो इस समय बड़ा हो, वह बाद में भी बड़ा हो जाए। मूल्‍यांकन समाज करेगा। चार से पांच पन्‍ने के लेख से लेकर चालीस पन्‍ने के लेख को संपादित कर देने का काम अनुपम मिश्र ही कर सकते थे।

 

जलसंचयन पर किया उम्दा काम 

पर्यावरण पर उनके काम को भला कैसे भूला जा सकता है. उनके अंदर इस बात को लेकर ललक जगी कि आखिरकार राजस्थान में पीने का पानी नहीं है तो फिर राजस्थान टिका कैसे है? फिर उन्होंने वहां के लोगों से, बड़े–बुजुर्गों से बात की. शोध के बाद पाया कि वहां के समाज ने पानी की व्यवस्था खुद शुरू की थी.

यहां के लोगों ने अपने काम के मुताबिक खुद ही तालाब बनाए और जलसंचय के जरिए अपनी सालों पुरानी सभ्यता और संस्कृति को सहेजकर रखा जिसपर मरुभूमि की तपती हवाओं के झोंके भी कुछ खास नहीं कर पाए.

उनकी रचना ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ उस दौर का सही चित्रण प्रस्तुत करती हैं जो कि पर्यावरण के लिहाज से आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं.

तालाब सूना हुआ :

हाल फिलहाल वे इंफोसिस होकर आये थे . इंफोसिस फाउण्डेशन ने उनको सिर्फ इसलिए बुलाया था कि वे वहां आयें और पानी का काम देखें. अनुपम जी गये और कहा कि आपके पास पैसा भले बाहर का है लेकिन दृष्टि भारत की रखियेगा.

भारत और भारतीयता की ऐसी गहरी समझ के साक्षात उदाहरण अनुपम मिश्र ने कुल छोटी-बड़ी 17 पुस्तके लिखी हैं जिनमें अधिकांश अब उपलब्ध नहीं है. एक बार नानाजी देशमुख ने उनसे कहा कि आज भी खरे हैं तालाब के बाद कोई और किताब लिख रहे हैं क्या? अनुपम जी सहजता से उत्तर दिया- जरूरत नहीं है. एक से काम पूरा हो जाता है तो दूसरी किताब लिखने की क्या जरूरत है.

ऐसे थे अनुपम जी …

1948 में अनुपम मिश्र का जन्म वर्धा में हुआ था.पिताजी हिन्दी के महान कवि. यह भी आपको तब तक नहीं पता चलेगा कि वे भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे हैं जब तक कोई दूसरा न बता दे.

मन्ना (भवानी प्रसाद मिश्र) के बारे में लिखे अपने पहले और संभवतः एकमात्र लेख में वे लिखते हैं”पिता पर उनके बेटे-बेटी खुद लिखें यह मन्ना को पसंद नहीं था.” परवरिश की यह समझ उनके काम में भी दिखती है.

इसलिए उनका परिचय अनुपम मिश्र हैं. भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे अनुपम मिश्र कदापि नहीं.

उनके इस टेड टॉक वीडियो से आप सहज ही जान जायेंगे की कैसे थें अनुपम मिश्र …

मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि उनसे मिला, बातें की , संपर्क में रहा और उन्हें नज़दीक से जाना …स्वर्गीय श्री महेंद्र जोशी जी को पुन: धन्यवाद उन्होंने मुझे अनुपम जी से मिलवाया …

 

-समीर शर्मा 

लेख में कई जानकारियाँ विभिन्न इन्टरनेट स्त्रोतों से भी जुटाई हैं |

समीर शर्मा | इंदौर | २०-१२-२०१६ अनुपम मिश्र नहीं रहे !   "अनुपम मिश्र जी पानी बचाने के लिए हमेशा आगे रहे, जिसका उदाहरण है जब भी उनके यहां जाएं तो पूछते थे कितना पानी पियोगे - आधा गिलास या उससे ज्यादा या फिर पूरा गिलास, जितना पियोगे उतना ही दूंगा. पानी बहुत कम है. इसे बर्बाद मत करना." आज की मोबाइल जनरेशन और मिनरल वाटर पीते हुए युवा और आमजन को शायद पता भी नहीं होगा कि कौन थे अनुपम मिश्र !!! पानी के योद्धा , गांधीवादी और जैसा दिखने वाला, वैसा लिखने वाला और ठीक वैसा ही जीने वाला..! संक्षिप्त…

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Founder and Editor, www.ohindore.com